Thursday, 15 June 2017

धर्मनिरपेक्षता के मायने

बचपन से सुनते और पढ़ते आये हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहां सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान किया जाता है। अब ये जो हमे उपदेश दिया जाता है कि सभी धर्मों का सम्मान किया करो, मुझे लगता है कि हमको अप्रत्यक्ष रूप से धमकाया जा रहा कि बेटा अगर धर्म से जुड़ी किसी भी गलत प्रथा के खिलाफ कुछ कहा तो बेटा तुम्हारो खैर नही। सारी समस्या की जड़ धर्मनिरपेक्षता की यह गलत परिभाषा ही है।।

धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक अर्थ होता है धर्म को निरपेक्ष मानना मतलब कि राज्य को धर्म से अलग करना और धार्मिक आधार पर भेदभाव न करना। साथ ही धर्म को पूर्ण रूप से व्यक्तिगत मामला मानना भी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा में शामिल है। पर क्या ऐसा हो पाया? धार्मिक स्वतंत्रता एवं समानता के नाम पर सभी धर्मों में एक ऐसी होड़ शुरू हुई कि धर्म की महानता का आंकलन लाउडस्पीकर की आवाज और सड़क पर यातायात ठप्प करने की क्षमता से होने लगा। साथ ही हज सब्सिडी, किसी भी कार्यक्रम के आरंभ में दीप प्रज्वलित करना और इतने वर्षों बाद भी समान नागरिक संहिता लागू न कर पाना इन सबसे तो यही साबित होता है कि राज्य  ने कभी भी खुद को धर्म से अलग नही किया और न ही इस प्रकार की कोई चेष्ठा की। यद्यपि यह असुरक्षा की भावना सभी धर्मों में पाई जाती है पर क्योंकि हिन्दू और मुस्लिम देश की आबादी का 95% हिस्सा हैं तो किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए इन दोनों समुदायों के योगदान अनिवार्य है।

अब भला धर्मनिरपेक्षता में धर्म का सम्मान करने की बात कहां से आ गयी। भई सम्मान तो अर्जित किया जाता है। यह कोई डरा धमका कर लेने वाली चीज नही। मानते हैं कि भारत के संविधान में सभी को धार्मिक क्रिया कलाप का अधिकार दिया गया है पर फिर उसी संविधान में मौलिक कर्तव्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने को भी तो कहा गया है। स्वामी विवेकानंद जी भी कह कर गए है कि किसी भी बात को केवल इसलिए सवीकार न करो कि कोई महापुरुष या महान ग्रंथ ऐसा कह कर गए हैं बल्कि उसे तर्क की कसौटी पर परखो और स्वयं विश्लेषण करो। फिर भला धार्मिक मान्यताये तर्क और विश्लेषण से उन्मुक्त कैसे हो सकती हैं?

धार्मिक ग्रंथ भी तो हमारे आपके जैसे इंसानो ने ही लिखे है। फिर वे तार्किक आलोचना और समकालीन नैतिक मूल्यों से ऊपर कैसे हो सकते हैं। समकालीन इसलिए कि मानव सभ्यता के निरंतर विकास के साथ मूल्य भी बदलते हैं। इसी को तो प्रगतिशीलता कहते हैं। अब आज से 1500 2000 वर्ष पहले अगर धार्मिक ग्रंथों में सामाजिक व्यवहार के निर्देश लिखे गए तो यह संभव है (जी हां निश्चित तौर पर नही) कि वो तात्कालिक मूल्यों के अनुसार अनुकरणीय हो, पर वर्तमान  में यदि वो स्त्री पुरुष समानता और प्रगतिशीलता के खिलाफ जा रहे हो तो वो सम्मान के नही त्यागने के योग्य हैं। अब अगर इससे किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचती भी है तो मानव समाज के व्यापक कल्याण के लिए उसे नज़र अंदाज़ करना ही होगा।

और फिर कौन सा ऐसा सामाजिक परिवर्तन हुआ है जिससे कुछ लोग नाराज न हुए हो? कौन से ऐसे अंधविश्वास और रूढ़ियां हैं जिनके खिलाफ आवाज़ उठाने से लोगो की धार्मिक भावनाएं आहत न हुई हो? बात चाहे ट्रिप्प्ल तलाक की हो या मंदिरों मे महिलाओं के प्रवेश की, बिना धर्म के पहरेदारों को नाराज किये आप सकारात्मक बदलाव नही ला सकते।

यह तो भला हो अंग्रेज़ो के ज़माने का जो राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा बंद करवा दी, श्री ईश्वरचंद विद्यासागर ने विधवा विवाह को मान्यता दिलाई। यद्यपि धर्म सुधार के इन प्रयासों से निश्चित तौर पर काफी लोगो की धार्मिक भावनाएं आहत हुई होंगी पर आखिरकार समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। अब यदि यही सुधारक आज के समय मे ऐसी ज़ुर्रत करते तो या तो वे अपनी जान से हाथ धो चुके होते अथवा किसी जिला अदालत ने धार्मिक आस्था को ठेस पहुचाने के आरोपों का सामना कर रहे होते। आखिर डॉ नरेंद्र दाभोलकर के अंजाम से हम सभी वाकिफ है।

दाभोलकर जी का कसूर मात्र इतना था कि उन्होंने धार्मिक अंधविश्वासों और अंध श्रद्धा के खिलाफ आवाज़ उठाई और जनता को जागरूक करने का प्रयास किया। अब इसकी तुलना आप 19वी सदी के धर्म सुधार आंदोलन और 20वी सदी के शहीदे आज़म भगत सिंह की रचना 'में नास्तिक क्यों हूँ' से करिये। सोचने वाली बात है कि क्या भारत आज से 200 या 100 वर्ष पूर्व ज्यादा उदार और प्रगतिशील था? उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि कब तक हम आस्था और श्रद्धा के नाम पर धार्मिक रूढ़ियों और कुरीतियों को बर्दाश्त करते रहेंगे?

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