Thursday, 7 May 2015

अपराध की उम्र

किशोर न्याय कानून में होने वाले संशोधन के अंतर्गत जघन्य अपराधो के लिए आयु सीमा 18 से घटाकर 16 करने के प्रस्ताव को लेकर बहस जारी है। विभिन्न सामाजिक संगठन बाल अधिकारों तथा उससे सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों का हवाला दे रहे हैं। पर इन्ही संधियों पर हस्ताक्षर करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अनेक यूरोपीय देशो में भी अपराध की बर्बरता और गंभीरता को देखते हुए 18 वर्ष से कम आयु वालो पर भी सामान्य अदालत में मुक़दमा चलने का प्रावधान किया गया है।

यह समझना मुश्किल है कि जो व्यक्ति बलात्कार जैसा अपराध करने की शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वाता रखता है उसे किस आधार पर मासूम किशोर माना जा सकता है। केवल इसलिए कि वह 18 वर्ष की निर्धारित आयु सीमा से कुछ दिन या महीने छोटा है।

बेहतर यह होगा कि एक न्यूनतम आयु सीमे जैसे 10 या 12 वर्ष( जैसा की अमेरिका तथा फ्रांस आदि देशो में हैं) तथा एक ऊपरी सीमा जैसे 18 वर्ष निर्धारित की जाए। अब इस आयु वर्ग में आने वाले अपराधियो पर किये गए अपराध की गंभीरता के आधार पर मुक़दमा चले।

देखा जाए तो किसी भी अपराध की प्रवृति के आधार पर ही यहाँ तय किया जा सकता है कि दोषी पर मुक़दमा सामान्य न्यायलय में चलना चाहिए या किशोर न्यायलय में। अपराधी को दंड देने का एक उद्देश्य संभावित अपराधियों में कानून का भय पैदा करना भी है। वर्ना फिर कोई साढ़े सत्रह साल का 'मासूम' बलात्कार एवं हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बाद भी किशोरे कारावास में अधिकतम 3 साल गुजार कर खुले आम घूमता रहेगा और न्याय व्यवस्था का मजाक उडाता रहेगा।
Also published on editorial.page of Jansatta and Hindustan newspaer of 30.04.2015

http://epaper.jansatta.com/490852/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-01052015?show=touch#page/6/2




http://epaper.livehindustan.com/story.aspx?id=266300&boxid=84607796&ed_date=2015-05-01&ed_code=1&ed_page=10




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