Sunday, 3 September 2017

आस्था का मायाजाल

एक बार फिर से त्योहारों का मौसम आ गया है। फिर एक बार गली मोहल्ले के बेरोजगार महीने दो महीने के लिए व्यस्त हो जाएंगे। एक बार फिर से चंदे के नाम पर हफ्ता वसूली शुरू हो जाएगी। फिर एक बार श्रद्धा के नाम पर फिल्मी गानों पर छिछोरी हरकते करने का सुनहरा अवसर मिलेगा। फिर एक बार हर 200 मीटर की दूरी पर पंडाल लगाकर अपनी धार्मिक असुरक्षा की भावना को लाउडस्पीकर के शोर से दबाने का प्रयास किया जाएगा। और एक बार फिर यातायात ठप्प करके यह संदेश दिया जाएगा कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति भूले नही हैं और धार्मिक आस्था के सार्वजनिक प्रदर्शन का ठेका किसी एक मजहब ने लेकर नही रखा है।

तिलक जी ने चाहे जिस उद्देश्य से गणेशोत्सव का प्रारंभ किया हो, इतना स्पष्ट है कि बाज़ारवाद के इस दौर में यह धार्मिक आस्था के प्रदर्शन का एक सशक्त माध्यम है। धर्मनिरपेक्षता का नियम कहता है कि अगर एक बार कोई प्रथा धार्मिक आस्था से जुड़ गई तो वो अनंतकाल तक चलेगी। धर्मनिरपेक्षता का दूसरा नियम कहता है कि अगर धर्म 'क' को मानने वाले चार दिन सड़क जाम करते हैं तो "ख' धर्म वालो को भी कम से कम उतने दिन हुल्लड़ मचाने  का मौलिक अधिकार है। ऐसे में कुछ सोचने समझने और समझाने के लिए न ही कोई गुंजाइश बकरी है और न ही वक्त।


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